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सोमवार, २३ जानेवारी, २०२३

आजकल कुछ लिख नही रहा


आजकल कुछ लिख नही रहा
आजकल कुछ ठीक नही रहा

हर जुल्मपे आवाज उठानेवाला
आजकल कुछ चीख नही रहा

आँखों में कितने अक्स थे तेरे
आजकल कुछ दिख नही रहा

क्या देश पूरा नीलाम हो गया?
आजकल कुछ बिक नही रहा

हर चीज संजोए रखी थी कभी
आजकल कुछ टिक नही रहा

उम्रभर एक नाम के क़सीदे पढ़े
आजकल कुछ सीख नही रहा

वो याद नहीं करती, अत: राहुल
आजकल कुछ छींक नही रहा



..

शुक्रवार, १४ ऑक्टोबर, २०२२

तख़ल्लुस


इक इतने से तख़ल्लुस का, कितना बडा बोझ था
सुकून बस इक पल का, और दर्द कईं रोज था

कुछ अनकही दास्तानों में ही खोया रहा उम्रभर
न बना किसी का साहीर, ना मै कोई इमरोज था

तुम थे मेरे ग़म और ख़ुशी दोनों का ही ज़रिया
मरहम था तेरा पास आना, दूर जाना सोज़ था

दुनिया से ताउम्र लड़ता ही रहा हूँ अपनी जंगें
कभी था अकेला सिपाही, कभी मै पूरी फौज था

जिंदगी के तजुर्बे ने सिखाया कि मेरी कहानी में
हक़ीक़त थी गंगू तेली, पर ख्वाब राजा भोज था

सरहदें तोड़नी चाहीं मगर अपने दायरे में ही रहा
मै किनारे से टकराकर, मिट जानेवाली मौज था

राहुल तेरी क़ीमत इस दुनिया में होगी ही कितनी
तू किसी से था खोया, और किसी की खोज था






*तखल्लूस-शायरीतले नाव
*ज़रिया-Source
*सोज़-दुःख


शनिवार, ७ ऑगस्ट, २०२१

अनुठा हुआ है

सदियों से एक ख्वाब आँखों में टुटा हुआ है
आ भी जाओ कि अब के सावन रुठा हुआ है

उपरी मुस्कान की दौलत पे न जाना दोस्तों
मुझे अंदर से किसीने पुरी तरह लूटा हुआ है

तुमने लबों से छुए थे जिस नज्म के चंद लफ्ज
उसके मिसरे ने कहा कि एक शेर जुठा हुआ है

कभी सोचा नही था की हम इतना सोचेंगे तुम्हें
ये एहसास नया है, इस बार कुछ अनुठा हुआ है

तुम सुकुन की बरसात बनकर यहाँ आ जाओ
मुझमें जज्बातों का लावा कबसे फुटा हुआ है

ये कैसा वक्त है कि इमाँ के मानी ही बदल चुकें
मैने जो सच कहा था वो भी अब झुठा हुआ है

तुम अपने नाम की ठंडी महक सांँसों में दे जाना
इस गुमनामी से मेरे वजूद का दम घुटा हुआ है

मै उजालों के बोझ लिये धूप धूप जलता रहा
और वो कहता है कि राहुल और कलुटा हुआ है



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सोमवार, १२ जुलै, २०२१

चलो इक बार फिरसे अजनबी बन जाएँ हम दोनों

क्या इक बार फिरसे अजनबी बन गएँ हैं हम दोनों
बिन कुछ कहे ही शर्त ए जुदाई मान गएँ हैं हम दोनों

न चैन है जरा हमको, और न तुमको थोडा भी करार है
क्यूँ यूँ सुलगती आग में जलने पे ठन गएँ हैं हम दोनों

कोई शिकवा नही रखा, कोई गीला भी नही किया
कैसी रंजीदगी है कि बिना रुठे ही मन गएँ हैं हम दोनों

बेखुदी में सोचते रहें की उलझ रही हैं दो रुहें, जब कि
आसानी से सुलझ गया जो रिश्ता बुन गएँ हैं हम दोनों

कितना कुछ कहना है आपसे मगर कह नही पातें हैं
ऐसी खामोशी है कि जैसे हो बेजुबान गएँ हैं हम दोनों

जिंदगीभर हमें आप के साथ चलना था मेरे हमसफर
पता ही न चला कब अलग राहें चुन गएँ हैं हम दोनों



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मंगळवार, ६ जुलै, २०२१

दीप्ती और उर्मिला

आपकी नई तसवीर नही है पास मेरे
और आपने कोई डीपी भी नही लगाई है
कितने रोज हुए खामोशी में बहते हुए
चॅटबॉक्स में इक अजीब सी तनहाई है

कितनी मायूसी से बीत गया वो स्टेटस
आपकी नजर से जो नजर मिला न पाया
फूट फूट रोई वो हर नज्म मेरे सामने
जिसे मै आपकी आवाज दिला न पाया

अपनी वोही पोस्ट हमें अच्छी लगती है
जिसे आपके लाईक का तोहफा मिले
जितनी बार नोटीफिकेशन में आपका नाम हो
लगता है हम आपसे उतनी दफा मिले

बातचित नही करनी तो ना सही
खैरियत पुछने का सिलसिला तो रहे
आप नहीं तो मेरे स्टेटस में आपके मानिंद
कभी दीप्ती और कभी उर्मिला तो रहें



..

शुक्रवार, २८ मे, २०२१

जरासी बात

जरासी बात पर भी अक्सर भर आने लगे हैं
अश्क तेज़ाब बनकर दिल को जलाने लगे हैं

वो भी दौर था के अपनापन था रिश्तों में
अब तो लोग बस फर्ज़ निभाने लगे हैं

हमसफर थे जो जिंदगी के इस कारवाँ के
वो शक्स सफर अधूरा छोड कर जाने लगे हैं

युंँ तो पोंछ दिये थे हाथों से कईं दफा मगर
ज़ख्म फिरसे आँखो में आने लगे हैं 

जिंदादिल तो तब थे जब जेबें खाली थी
जरूरतों ने मार दिया, जबसे कमाने लगे हैं

जिनसे बदतमीजी ही तमीज हुआ करती थी
वो दोस्त आजकल तहजीब सिखाने लगे हैं

छोड आता हूंँ हर रोज गांव की सरहद पर
दर्द बिल्ली की तरह फिर लौट आने लगे हैं

खुशियों का कारोबार थम सा गया है और
अब हम अपने दुःख पे भी लाइक्स पाने लगे हैं

*ये कहना था उन से मोहब्बत है मुझ को
ये कहने में मुझ को ज़माने लगे हैं

अपने ही दिल पर और सितम ढाने लगे हैं
इश्क के मज़लुम फिर इश्क लडाने लगे हैं



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*हा शेर जनाब ख़ुमार बाराबंकवी यांचा आहे

बुधवार, १९ मे, २०२१

पास रहती है

टुटे दिल मे भी इक दिवानी सी आस रहती है
दम घुटे रिश्तों में भी कहीं थोडी सांस रहती है

यारों ये मुहब्बत इक ऐसी अजीब बिमारी है 
जो आम होके भी हर किसी की खास रहती है

युँही नही महका करते ये रंगीं बदन फुलों के
उन्हे भी किसी दीदावर की तलाश रहती है

बहती हुई नदी को देख कर हैरान होता हूंँ मै
भरी होके भी उसे समंदर की प्यास रहती है

भूख नही मिटती आजकल शमशान घाट की
हर वक्त वहाँ भुनती हुई कोई लाश रहती है

वो मोड जहाँ से आगे घर दिखाई नही देता
लौटते वक्त वहाँ की सडक उदास रहती है

कौनसे युनिट मे नापोगे इस फासले का दायरा?
वो दूर है मुझसे पर दिल के बहुत पास रहती है



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गुरुवार, ६ मे, २०२१

प्रितम प्यारे

साँस लेना भी कैसी आदत है
जीये जाना भी क्या रवायत है
-गुलजार
...
आम ही तो दिन था कल भी इस न्यू नॉर्मल का,
हाँ कुछ सिलवटें दिखीं थीं आसमाँ के बिस्तर पे,
दोपहर में थोडे गर्म झोंके चुभे थे आँखो में,
कंधे झुके झुके से लग रहे थे सामनेवाले पहाड के,
शाम को पेडोंके पत्ते झटपटा के दबी सी आवाजों में कुछ सिरीयस बात कर रहे थे..
मगर अंदेशा कतई नही आया था आनेवाली खबर का..

अभी चंद दिन पहले ही तो लाया था रेमडेसीविर कहींसे जुगाडकर,
'सब ठीक है' बता रहे थे बाकी यार दोस्तों को हम खुद हर रोज,
वो डॉक्टर दोस्त जो देख चुका है इस साल कईं कोविड के और भी सिरीयस मामलें,
कह रहा था 'स्लो है मगर इंप्रूव्हमेंट है'
व्हिडीओ कॉल में देते थे तसल्ली, होती थी हौसला अफजाई,
हर बार फोन रखने पे भर आती थी इक उदासी सी, 
एक दुसरे को मगर कहते रहते, 'अब ठीक है', 
सब ठीक लग भी रहा था...
हाँ मगर दवाईयों की, तसल्लियों की और दुवाओं की भी अपनी इक लिमिट है,
कहने को स्लो इंप्रूव्हमेंट होती रही मगर
सांसोंपे लगे बायपॅप मास्क के पहरे आखीर तक हठे ही नहीं
SpO2 नामक कोई जरुरी लेव्हल खुन में रूठी ही रही इतने दिन
धीमे धीमे टूटते ही रहे फेफडों के रेशें..
पुरा चेहरा भी नही देख पाये आखरी कॉल में आक्सिजन मास्क के पीछे,
और अब कभी देख भी नही पायेंगे..
वो स्कूल, वो हॉस्टल, नोंक झोन्क, गिले शिकवे,
मस्तियाँ, किताबें, वो पुरा का पुरा बचपन...
सबकुछ समेटकर हमे सौंपकर बस खामोशी से वो चल दिया
इतनी हताशा, इतनी बेबसी ताउम्र के लिये हमें थमाकर बस चल दिया..

सांँस लेना भी कैसी बुरी आदत है,
जीये जाना भी क्यों इतनी मुश्किल रवायत है?


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बुधवार, २८ एप्रिल, २०२१

सब चंगा सी

सांँसों का थोडा पंगा सी, जुबाँ पे जरा अडंगा सी
झूठ नही बोलता मै, मुल्क में बाकी सब चंगा सी

फिजा मे नफरतों का जहर सी, सुबह भी दोपहर सी
भाईचारे की बात करो तो, भडकता है यहाँ दंगा सी
झूठ नही बोलता मै, मुल्क में बाकी सब चंगा सी

सियासी हिसाब पे पर्दा सी, सिस्टीम बनी मुर्दा सी
चोर हैं शाही लिबासों में, और राजा भइल नंगा सी
झूठ नही बोलता मै, मुल्क में बाकी सब चंगा सी

बढती बिमारी ए करोना सी, हर इक आँख में रोना सी
हवाओं में इतना मातम फैला, कि झटपटाता तिरंगा सी
झूठ नही बोलता मै, मुल्क में बाकी सब चंगा सी

इलाज मिलने में देर सी, अस्पतालों में लाशों के ढेर सी
जानेवाली जानें हैं सस्ती, दवा का इंतजाम महंगा सी
झूठ नही बोलता मै, मुल्क में बाकी सब चंगा सी

फेफडों में आक्सिजन कम सी, शमशानों में मातम सी
किसने फैलाई ये आग, किसका दामन खून में रंगा सी
झूठ नही बोलता मै, मुल्क में बाकी सब चंगा सी

हर शक्स यहाँ मजबूर सी, हुकुमत बडी ही मगरूर सी
पाप क्या, खुद को धोते धोते, थक गयी नमामी गंगा सी
झूठ नही बोलता मै, मुल्क में बाकी सब चंगा सी

यारियाँ मजहबों में बांँटी सी, हर एक आवाज काटी सी  
कलम रोक ले लिब्रांडू, वरना मिल जायेगा कहीं टंगा सी



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सोमवार, १९ एप्रिल, २०२१

गलत बात

एक मुठ्ठीभरसा दिल है, जिसकी मुठ्ठी में मेरी कायनात है,
मै अपने अंधेरे छाँट रहा हूंँ, तेरे उजालों की सौगात है।

कहीं कोई शोर छूट रहा है, कहीं इक खामोशी टूट रही है,
कुछ वफा के ऐब हैं मुझमें, कुछ इबादत के इल्जामात हैं।

सांँझ की बोझल आंँखों में, सिमटीसी मंद रौशनी है,
इक आधा बुझा दिन है, इक आधीसी जली रात है।

नही है उसे चाहना लेकीन, चाहत पे नही इख्तियार मेरा, 
उसके खयाल पे खिलती है धूप, सोचूँ तो होती बरसात है।

उम्मीद करोगे टूट जायेगी, खुशी चाहोगे तो रुठ जायेगी,
मोहब्बत वो बला है जिसमे, अपनी शह ही अपनी मात है।

छुपाये रखा है उसे, खुद उसीसे छुपाकर दिल में मगर
खुशबू मेरे एहसासों की अब, डाल डाल है पात पात है।

अगरचे सच्ची है मेरी चाहत, अगरचे पाक मेरे जज्बात हैं,
खूबसुरत है मेरा इश्क मगर, गलत बात तो गलत बात है।




..

गुरुवार, ३१ डिसेंबर, २०२०

2020


एक साल ये कुछ ऐसे गुजर गया
कोई बोझ जैसे सीने से उतर गया

खिलखलाती मुस्कानों को कैद कर के
आंँखो में उदासी का पानी भर गया

सबको जीने मरने की जंग में उतारकर
जाने कितनी जिंदगियों को कुतर गया

मुखौटे पहनकर जीनेवाले चेहरों पर
ये मजबुरियोंके और नकाब धर गया

भूख जलते पांवों से रास्तोंपे चलती रही
जाने कौन घर गया और कौन मर गया

चलती फिरती दुनिया को लगाम लगाई
सारा जहाँ जैसे बेजान सा ठहर गया

एक ख्वाब मेरी आंखो में कत्ल हुआ
दिल टूटकर चारो तरफ बिखर गया

मार्च मे आया था एक बुरा सपना बनकर
चलो उसे खत्म करके ही दिसम्बर गया

एक साल ये कुछ ऐसे गुजर गया
कोई बोझ जैसे सीने से उतर गया

 

 


..

रविवार, २० डिसेंबर, २०२०

चिकू हॅप्पी तो मै हॅप्पी



मै कहीं दूर किसी पहाड की चोटी पे
कुछ हसरतें बो रहा था एक बंजर सी मिट्टी पे
कुछ सर्द सी सिसकियाँ थी, जो मैने दिल की आग में तापी
चिकू हॅप्पी तो मै हॅप्पी

मैने उम्मीदों के अलाव में उसे नही जलाया
मैने उसे कोई वास्ता देकर नाम से नही बुलाया
मैने कभी उससे अपने रिश्ते की गहराई नही नापी
चिकू हॅप्पी तो मै हॅप्पी

ख्वाबों के परिंदे पलको से उतार दिये
कुछ संभाले हुए लम्हें थे, मैंने गुजार दिये
खिलखिलाते सिलसिले पे रख दी, इक लंबी सी चुप्पी
चिकू हॅप्पी तो मै हॅप्पी



.

शनिवार, १८ जुलै, २०२०

कोई रिश्ता

कभी तू कोई मुरत कभी साया सा लगे
कभी बहुत अपना कभी पराया सा लगे

मैने कई लम्हों के अलाव जला के देखें हैं
तेरे बगैर गुजरा हर इक पल ज़ाया सा लगे

जब से तुम गये हो मेरी नजरोंसे बुझकर
हर इक अक्स आँखों में जलाया सा लगे

तेरे नजदीकी की महक जो खो गयी तो
मेरी सांसों का चमन मुरझाया सा लगे 

तेरे कंधे पे पीली धूप कैसी फुरसत से उतरी
जुल्फोंमें इक झोंका युँही बौखलाया सा लगे

जब जब उम्मीदों के चराग बुझने लगते हैं
तेरा एहसास फानुस बन के आया सा लगे

इक अरसा हो गया कोई जलसा किये हुए
अब बस तेरा रुठनाही कुछ मनाया सा लगे

जब भी चौथ का चांद देखता हूँ तो मुझे
तेरीही आँखोकी झील में नहाया सा लगे

नाम नही इसका कोई मगर कई जन्मों से
कोई गहरा रिश्ता तुझसे निभाया सा लगे



अलाव- मशाल/शेकोटी
ज़ाया- वाया जाणे
अक्स - प्रतिमा
फानुस- दिव्याला हवेपासून वाचविणारी काच



.

गुरुवार, २ जुलै, २०२०

जो हमारे दिल में था


हम उसे सारे जमाने से मांगते रहे, वो जो हमारे दिल में था
अकेले था तो साथ था मेरे, और तनहा भरी महफील में था

मुझे इक सफर चाहिए जिसमे हर कदम वो हमकदम चाहिए
मेरी खामोश सी चाहत का हासिल कब किसी मंजिल में था

लोग कहते होंगे दिल की बात, चांद सितारों की चमक के साथ
हमारे इजहार का दायरा तो बस आँखों की झिलमील में था

कितनी आसानी ने कर दिया उसने हमे खुद से यूँ दरकिनार
पर मेरी दिवानगी को मिटाने का हुनर कहाँ उस कातिल मे था

अब सीखना है सलीका मुझे भी जरा उसकी तरह बेरूखी का
दिल ने कोई अंजाम सोचा न था इसलिये बडी मुश्किल में था

तमाम हसरतें अपनी तो समंदर की गहराईयोंमे डूबने की हैं
हमारे दिल की चाहतों का बसर कब उथले साहील में था

उसने आँखो से जाने कितने रंग उतार दिये मुझे देखने के बाद
युं उजड जाने का सिला बदकिस्मती से मेरी ही हासिल मे था



..

मंगळवार, १७ डिसेंबर, २०१९

सराबोर

उनकी निगाहों में मैने कुछ रूहानी चाहतोंके भंवर देखें हैं
उन्होने जहाँ जहाँ छुआ था, मैने वहाँ तितली के पर देखें हैं

मुझसे नही बोला जायेगा जो मैं बोलना बहुत चाहता हूं
मैंने नहीं कोई लफ्ज अपने एहसासों से बेहतर देखें हैं

हमने सुन लिया, जो उन खामोश नजरों ने कह दिया था
उनकी धुंदली सी मुस्कान में मैंने उम्मीदोंके घर देखें हैं

चैन-ओ-सुकून जो मेरे जहाँ से कब के रुख़्सत हो गए थे
मैंने मेरे महबूब के चमन में बसे उनके आबाद शहर देखें हैं

उनके साथ बीते चंद पल मेरी उम्र के सबसे मुबारक लम्हे थे
वरना हमने तो जिंदगी भर बस उदासियोंके शाम-ओ-सहर देखें हैं

वे क्या जानें कितनी सराबोर थी उनके विदा होने की घडी
उन्होंने कहाँ पलट के मेरी आँखों में उतरे समंदर देखें हैं





सोमवार, १४ ऑक्टोबर, २०१९

कोजागिरी

किसने इतना बड़ा मोती ढूंढकर बनाया होगा चाँद
कौन मेरे इतने करीब खींचकर लाया होगा चाँद

इस काले आसमान के इनबॉक्स में जाने कहाँ से
ब्लॅक अँड व्हाईट फोटो बनके आया होगा चाँद

उनके छत पे भी थोडी चाँदनी उबलकर गिरी होगी
इक प्याली दूध में जो आज नहाने गया होगा चाँद

मशरीक से अपने फलक पे आते हुए देखा था मैने
किसीने फुंक मारकर मेरी तरफ उडाया होगा चाँद

रात उसे आँखो में भरकर पलकें बंद की थीं मैने
पता नही सुबह किस बूँद संग बह गया होगा चांँद

मै जानता हूँ वो किसी और की छत का रौशनदान है
फिर भी क्यूँ मेरे पूरे जहाँ पे इतना छाया होगा चाँद





.. 

गुरुवार, १० ऑक्टोबर, २०१९

कल तक जो बेगाने थे, जन्मों के मीत हैं

न रिश्तों के बंधन हैं, ना कोई रिवाज़, ना रीत है
कल तक जो बेगाने थे, जन्मों के मीत हैं

सोहबत की हवाएँ जो खुशबू बन के सीने में महकतीं हैं
बातों की आवाजें जो गीत बन के कानों में चहकतीं हैं
चेहरों की रौशनी जो दीदार बन के आँखों में दहकती है
हमें जिंदगी के ऐसे सारे हसीन तोहफों से प्रीत है
कल तक जो बेगाने थे, जन्मों के मीत हैं

साथ गुजारे इक इक लम्हे में जैसे कईं सदियाँ मिलीं
हमराह बन के जहाँ जहाँ से चले, फुलों की वादियाँ मिलीं
खुश्क सहाराओं में भी संगत की सुकून भरी नदियाँ मिलीं
ये मुक़द्दरों का नही, दिल के मरासिमों का निहित है
कल तक जो बेगाने थे, जन्मों के मीत हैं

कभी जो मै चलते हुए फिसला तो थामने चले आएँ
मुसीबतों के दौर आये तो ढाल बन के सामने चले आएँ
मुश्कील राहों पे भी मैने पुकारा तो साथ घुमने चले आएँ
ये दोस्त ही जिंदगी का सबसे अनमोल संचित है
कल तक जो बेगाने थे, जन्मों के मीत हैं

मैने नही मांगा था कोई सुरज की सुर्ख रौशनी का गांव
मैने तो नही चाही थी चांद के शीतल चांदनी की छांव
मैने नही लगाए थे अपनी किस्मत से ख्वाहिशों के दांव
इक कतरे का यूँ पुरे समुंदर से मिलना ही उसकी जीत है
कल तक जो बेगाने थे, जन्मों के मीत हैं, जन्मों के मीत हैं




..

शनिवार, २८ सप्टेंबर, २०१९

तुम्हारे भेजे फूलोंके रंग

मैने तुम्हारे भेजे फुलोंसे कुछ रंग चुने
की तुम्हारी हथेली पे मल दूँ
और फिर तुम्हारे रंगभरे हाथ तबतक थाम लूँ
जबतक मुझमें तुम्हारे सारे एहसासोंके
सुर्ख चिरागदान जगमगा न उठें,
जबतक हमारी भिनी भिनी
मुठ्ठियोंसे वो धुंआ न उमड़े
जो रुहोंकी दो चिनगारियाँ टकरा कर
एक दुसरे में मिट जाने से भभकता है

फिर जब इक सुकून की नर्म महकती हवा
रगों में खून के साथ बहने लगे,
मेरे कांपते होंठ तुम्हारी
पेशानी को छूकर वहीं जम जाएँ
और तुम सांस बनकर मेरे सीने में
भर जाओ इस तरह कि
जब साथ छूटे तो मेरी सांस ही छूट जाए..

तुम्हारे भेजे फूलोंके रंग
मेरी आंखोंसे बहुत अंदर तक रिसकर
देखो कितने सुहाने बन जाते हैं..!!

बुधवार, २५ सप्टेंबर, २०१९

धूप की तितलियाँ उड़ जाएं

इक हयात में जितना वाज़िब था शायद हमें मिल गया है,
अब उम्मीद के धूप की तितलियाँ यां से उड़ जाएं
या पत्तोंके सुहाने लिबास दरख्तोंसे उतर जाएं
आवाजें कुछ लंबी खामोशियों में गिर जाएं
और रूह से खुशियों के सारे मानी खो जाएं
आसमाओं के साये दिल की गीली धरती में दफ़्न हो
उम्मीदों के सैलाब गुमनामी की मुट्ठियों में जब्त हों
तेरी हथेली से मेहंदी जैसे चुपचाप अलविदा होती है,
वैसे मेरा वजूद सारे एहसासों से मिट जाए... 

जो कभी सोचा भी नहीं था, वो हासिल किया है,
इक हयात में जितना वाज़िब था शायद हमें मिल गया है..!!
अब धूप की तितलियाँ यां से उड़ जाएं...




बुधवार, २८ ऑगस्ट, २०१९

हजार मतलब

युं तो कभी दिलबर है, और कभी रकीब
दिल खुद ही इक मुश्किल है, खुद ही इक तरकीब

तेरा ख़याल तेरा मलाल दोनों एक समान
हकीकत की खुश्क जमीं, हसरतों का गीला आसमान 

तपती सुलगती रहीं हैं उम्रभर जिंदगी की कड़ियाँ
सब्ज दिखते हैं पेड़ लेकिन, भीतर जलती हैं लकड़ियाँ  

सौंधी ख्वाहिशें पिघल गईं जब भी अश्कों में नहाई
तेरी धुंदलीसी याद से भी अक्सर गहराती है मेरी तनहाई 
 
जाड़ों की ठंडी सुबह और तेरे बाहों की रजाई
वस्ल की हर रुत वफादार, हिज्र का हर मौसम हरजाई 

ख़्वाबों की पगडंडियों पे हाथों में हाथ थामकर चलना
तेरी नजदीकी से सुकून पाना, तेरी जुदाई से जी मचलना 

तेरे आवाज़ोंकी, तेरे दीदार की बेइंतहा तलब
दो लफ़्ज, दो स्माइली और उनके हजार मतलब





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